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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 3
अनीह आत्मा मनसा समीहता हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे । मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान्जुषन्निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ ॥
मन ही समस्त चेष्टाएँ करता है। उसके साथ रहने पर भी आत्मा निष्क्रिय ही है। वह ज्ञानशक्तिप्रधान है, मुझ जीव का सनातन सखा है और अपने अलुप्त ज्ञान से सब कुछ देखता रहता है। मन के द्वारा ही उसकी अभिव्यक्ति होती है। जब वह मन को स्वीकार करके उसके द्वारा विषयों का भोक्ता बन बैठता है, तब कर्मों के साथ आसक्ति होने के कारण वह उनसे बँध जाता है।
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