य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः ।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन्द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते ॥
इति श्रीमद्भागवतपुराणान्तर्गतम् अध्याय २३ स्कंध ११ भिक्षुगीता ॥
यह भिक्षुक का गीत क्या है, मूर्तिमान् ब्रह्मज्ञान-निष्ठा ही है। जो पुरुष एकाग्रचित्त से इसे सुनता, सुनाता और धारण करता है, वह कभी सुख-दुःखादि द्वन्द्वों के वश में नहीं होता। उनके बीच में भी वह सिंह के समान दहाड़ता रहता है।
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