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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 18
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः । मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः ॥
इस संसार में मनुष्य को कोई दूसरा सुख या दुःख नहीं देता, यह तो उसके चित्त का भ्रम मात्र है। यह सारा संसार और इसके भीतर मित्र, उदासीन और शत्रु के भेद अज्ञानकल्पित हैं।
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