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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 17
श्रीभगवानुवाच । निर्विद्य नष्टद्रविणे गतक्लमः प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम् । निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मादकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम् ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - (उद्धवजी!) उस ब्राह्मण का धन क्या नष्ट हुआ, उसका सारा क्लेश ही दूर हो गया। अब वह संसार से विरक्त हो गया था और संन्यास लेकर पृथ्वी में स्वच्छन्द विचर रहा था। यद्यपि, दुष्टों ने उसे बहुत सताया, फिर भी वह अपने धर्म में अटल रहा, तनिक भी विचलित न हुआ। उस समय वह मौनी अवधूत मन-ही-मन इस प्रकार का गीत गाया करता था।
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