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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 13
कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनस्तद्धि जडाजडत्वे । देहस्त्वचित्पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥
यदि कर्मों को ही सुख-दुःख का कारण मानें तो उनसे आत्मा का क्या प्रयोजन? क्योंकि वे तो एक पदार्थ के जड और चेतन-उभयरूप होने पर ही हो सकते हैं। (जो वस्तु विकारयुक्त और अपना हिताहित जानने वाली होती है, उसी से कर्म हो सकते हैं; अतः वह विकारयुक्त होनेके कारण जड होनी चाहिये और हिताहित का ज्ञान रखने के कारण चेतन।) किन्तु देह तो अचेतन है और उसमें पक्षीरूप से रहने वाला आत्मा सर्वथा निर्विकार और साक्षीमात्र है। इस प्रकार कर्मों का तो कोई आधार ही सिद्ध नहीं होता। फिर क्रोध किस पर करें?
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