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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 12
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥
यदि ग्रहों को सुख-दुःख का निमित्त मानें तो उनसे भी अजन्मा आत्मा की क्या हानि? उनका प्रभाव भी जन्म-मृत्युशील शरीर पर ही होता है। ग्रहों की पीड़ा तो उनका प्रभाव ग्रहण करने वाले शरीर को ही होती है और आत्मा उन ग्रहों और शरीरों से सर्वथा परे है। तब भला वह किसपर क्रोध करे?
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