यदि ऐसा मान लें कि देवता ही दुःख के कारण हैं तो भी इस दुःख से आत्मा की क्या हानि? क्योंकि यदि दुःख के कारण देवता हैं तो इन्द्रियाभिमानी देवताओं के रूप में उनके भोक्ता भी तो वे ही हैं और देवता सभी शरीरों में एक हैं; जो देवता एक शरीर में हैं; वे ही दूसरे में भी हैं। ऐसी दशा में यदि अपने ही शरीर के किसी एक अंग से दूसरे अंग को चोट लग जाय तो भला, किस पर क्रोध किया जायगा?
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