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भज गोविन्दम् • अध्याय 1 • श्लोक 32
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः। सेन्द्रियमानस नियमादेवं, द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम्॥
गुरु के चरण कमलों का ही आश्रय मानने वाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, इस प्रकार मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो।
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