यज्ञ, तप और दानरूप क्रिया में जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी 'सत्' - ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी 'सत्' - ऐसा ही कहा जाता है।
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