इसलिये वैदिक सिद्धान्तों को मानने वाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ऊँ' इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।
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