(सुग्रीव, श्रीरघुनाथजी से कहते हैं) - ‘कृपानिधान! आपके गुणों का कैसे वर्णन करूँ, आप (मेरे-जैसे) दुर्जन, गुणरहित, कुलहीन तथा अनाथ का पालन करने वाले हैं’।
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