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अष्टावक्र गीता • अध्याय 8 • श्लोक 4
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा। मत्वेति हेलया किंचिन्-मा गृहाण विमुंच मा॥
जब तक 'मैं' या 'मेरा' का भाव है तब तक बंधन है, जब 'मैं' या 'मेरा' का भाव नहीं है तब मुक्ति है। यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही करो।
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