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अष्टावक्र गीता • अध्याय 4 • श्लोक 6
आत्मानमद्वयं कश्चिज्-जानाति जगदीश्वरं। यद् वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥
आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है, जो ऐसा जान जाता है उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है।
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