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अष्टावक्र गीता • अध्याय 4 • श्लोक 5
आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे। विज्ञस्यैव हि सामर्थ्य-मिच्छानिच्छाविवर्जने॥
ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है।
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