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अष्टावक्र गीता • अध्याय 20 • श्लोक 2
क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः। क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा॥
सदा सभी प्रकार के द्वंद्वों से रहित मेरे लिए क्या शास्त्र हैं और क्या आत्म-ज्ञान अथवा क्या विषय रहित मन ही है, क्या प्रसन्नता है या क्या संतोष है।
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