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अष्टावक्र गीता • अध्याय 2 • श्लोक 23
अहो भुवनकल्लोलै-र्विचित्रैर्द्राक् समुत्थितं। मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते समुद्यते॥
आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में चित्तवायु उठने पर ब्रह्माण्ड रूपी विचित्र तरंगें उपस्थित हो जाती हैं।
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