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अष्टावक्र गीता • अध्याय 2 • श्लोक 18
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया। अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्॥
न मुझे कोई बंधन है और न कोई मुक्ति का भ्रम। मैं शांत और आश्रयरहित हूँ। मुझमें स्थित यह विश्व भी वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है।
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