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अष्टावक्र गीता • अध्याय 2 • श्लोक 16
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्य-त्तस्याऽस्ति भेषजं। दृश्यमेतन् मृषा सर्वं एकोऽहं चिद्रसोमलः॥
द्वैत (भेद) सभी दुखों का मूल कारण है। इसकी इसके अतिरिक्त कोई और औषधि नहीं है कि यह सब जो दिखाई दे रहा है वह सब असत्य है। मैं एक, चैतन्य और निर्मल हूँ।
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