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अष्टावक्र गीता • अध्याय 2 • श्लोक 14
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किंचन। अथवा यस्य मे सर्वं यद्वा ङ्मनसगोचरम्॥
आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है, जिसका यह कुछ भी नहीं है अथवा जो भी वाणी और मन से समझ में आता है वह सब जिसका है।
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