जनक उवाच-
तत्त्वविज्ञानसन्दंश-मादाय हृदयोदरात्।
ना नाविधपरामर्श-शल्योद्धारः कृतो मया॥
राजा जनक कहते हैं -
तत्त्व-विज्ञान की चिमटी द्वारा विभिन्न प्रकार के सुझावों रूपी काँटों को मेरे द्वारा हृदय के आन्तरिक भागों से निकाला गया।
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