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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 92
क्व स्वाच्छन्द्यं क्व संकोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः। निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः॥
योगी निष्कपट, सरल और चरित्रवान होता है। उसके लिए स्वच्छंदता क्या, संकोच क्या और तत्त्व विचार भी क्या।
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