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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 88
निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकांचनः। सुभिन्नहृदयग्रन्थि-र्विनिर्धूतरजस्तमः॥
धीर पुरुष की ह्रदय ग्रंथि खुल जाती है, रज और तम नष्ट हो जाते हैं। वह मिट्टी के ढ़ेले, पत्थर और सोने को समान दृष्टि से देखता है, ममता रहित वह सुशोभित होता है।
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