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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 86
पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः। स्वभावभूमिविश्रान्ति-विस्मृताशेषसंसृतेः॥
जो अपने आत्मस्वरुप में विश्राम करते हुए सभी प्रपंचों का नाश कर चुका है, उस महात्मा को शरीर रहे अथवा नष्ट हो जाये - ऐसी चिंता भी नहीं होती।
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