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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 84
निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च। निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः॥
जो धीर पुरुष पुत्र-स्त्री आदि के प्रति आसक्ति से रहित होता है, विषय की उपलब्धि में उसकी प्रवृत्ति नहीं होती, अपने शरीर के लिए भी निश्चिन्त रहता है, सभी आशाओं से रहित होता है, वह सुशोभित होता है।
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