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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 82
न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति। समदुःखसुखस्तृप्तः किंचित् कृत्यं न पश्यति॥
धीर पुरुष न संत की स्तुति करता है और न दुष्ट की निंदा। वह सुख-दुख में समान, स्वयं में तृप्त रहता है । वह अपने लिए कोई भी कर्तव्य नहीं देखता।
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