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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 72
स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः। क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता॥
जो अनंत रूप से स्वयं स्फुरित हो रहा है और प्रकृति की पृथक् सत्ता को नहीं देखता है, उसके लिए बंधन कहाँ, मोक्ष कहाँ, हर्ष कहाँ और विषाद कहाँ।
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