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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 66
क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनं। आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा॥
धीर पुरुष सदा आकाश के समान निर्विकल्प रहता है। उसकी दृष्टि में संसार कहाँ और उसकी प्रतीति कहाँ? उसके लिए साध्य क्या और साधन क्या?
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