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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 65
स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः। पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्निस्तर्षमानसः॥
वह आत्मज्ञानी धन्य है जो सभी स्थितियों में समान रहता है। देखते, सुनते, छूते, सूंघते और खाते-पीते भी उसका मन कामना रहित होता है।
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