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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 63
भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा। भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी॥
अज्ञानी की दृष्टि सदा भाव या अभाव में लगी रहती है, पर धीर पुरुष तो दृश्य को देखते रहने पर भी आत्म स्वरूप को देखने के कारण कुछ नहीं देखती।
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