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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 62
परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते। देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता॥
अज्ञानी पुरुष प्रायः गृह आदि पदार्थों से वैराग्य करता दिखाई देता है पर जिसका देह-अभिमान नष्ट हो चुका है, उसके लिए कहाँ राग और कहाँ विराग।
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