स्वभावाद्यस्य नैवार्ति-र्लोकवद् व्यवहारिणः।
महाहृद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते॥
जो बड़े सरोवर के समान शांत है और लौकिक आचरण करते हुए जिसको अन्य लोगों के समान दुःख नहीं होता, वह दुःख रहित ज्ञानी शोभित होता है।
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