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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 6
व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः। वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः॥
अज्ञान मात्र की निवृत्ति और स्वरुप का ज्ञान होते ही दृष्टि का आवरण भंग हो जाता है और तत्त्व को जानने वाला शोक से रहित होकर शोभायमान हो जाता है।
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