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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 56
सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते। तस्याश्चर्यदशां तां तादृशा एव जानते॥
लौकिक दृष्टि से प्रसन्न दिखने पर वह प्रसन्न नहीं होता और दुखी दिखने पर दुखी नहीं होता। उसकी उस आश्चर्यमय दशा को उसके समान लोग ही जान सकते हैं।
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