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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 54
श्रोत्रियं देवतां तीर्थम-ङ्गनां भूपतिं प्रियं। दृष्ट्वा संपूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना॥
धीर पुरुष शास्त्रज्ञ ब्राह्मण, देवता, तीर्थ, स्त्री, राजा और प्रिय को देख कर उनका स्वागत करता है पर उसके ह्रदय में कोई कामना नहीं होती।
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