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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 48
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः। नैवाचारमनाचार-मौदास्यं वा प्रपश्यति॥
शुद्ध-बुद्धि पुरुष वस्तु-तत्त्व के केवल सुनने मात्र से आकुलता रहित हो जाता है, फिर आचार-अनाचार या उदासीनता पर उसकी दृष्टि नहीं जाती।
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