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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 44
मुमुक्षोर्बुद्धिरालंब-मन्तरेण न विद्यते। निरालंबैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥
मुमुक्षु पुरुष की बुद्धि कुछ आश्रय ग्रहण किये बिना नहीं रहती। मुक्त पुरुष की बुद्धि तो सब प्रकार से निष्काम और निराश्रय ही रहती है।
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