भावस्य भावकः कश्चिन् न किंचिद् भावकोपरः।
उभयाभावकः कश्चिद्ए वमेव निराकुलः॥
कोई पदार्थ की सत्ता की भावना करता है और कोई पदार्थों की असत्ता की।
ज्ञानी तो भाव-अभाव दोनों की भावना को छोड़कर निश्चिन्त रहता है।
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