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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 41
क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै। स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥
जो आग्रह करता है, उस मूर्ख का चित्त निरुद्ध कहाँ है? आत्मा में रमण करने वाले धीर पुरुष का चित्त तो सदैव स्वाभाविक रूप से निरुद्ध ही रहता है।
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