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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 4
भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित् परमर्थतः। नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्॥
यह संसार केवल एक भावना मात्र है, परमार्थतः कुछ भी नहीं है । भाव और अभाव के रूप में स्वभावतः स्थित पदार्थों का कभी अभाव नहीं हो सकता।
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