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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 38
निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः। एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥
अज्ञानी निराधार आग्रहों में पड़कर संसार का पोषण करते रहते हैं। ज्ञानियों ने सभी अनर्थों की जड़ इस संसार की सत्ता का ही पूर्ण नाश कर दिया है।
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