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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 37
मूढो नाप्नोति तद् ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति। अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्॥
अज्ञानी को ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हो सकता क्योंकि वह ब्रह्म होना चाहता है। ज्ञानी पुरुष इच्छा न करने पर भी परब्रह्म बोध स्वरूप में रहता है।
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