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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 34
अप्रयत्नात् प्रयत्नाद् वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिं। तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः॥
मूढ़ पुरुष प्रयत्न से या प्रयत्न के त्याग से शांति प्राप्त नहीं करता पर प्रज्ञावान पुरुष तत्त्व के निश्चय मात्र से शांति प्राप्त कर लेता है।
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