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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 33
एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशं। धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः॥
मूढ़ पुरुष बार-बार (चित्त की ) एकाग्रता और निरोध का अभ्यास करते हैं। धीर पुरुष सुषुप्त के समान अपने स्वरूप में स्थित रहते हुए कुछ भी कर्तव्य रूप से नहीं करते।
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