असमाधेरविक्षेपान् न मुमुक्षुर्न चेतरः।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः॥
ऐसा ज्ञानी समाधि में आग्रह न होने के कारण मुमुक्षु नहीं और विक्षेप न होने के कारण विषयी नहीं है ।
मेरे अतिरिक्त जो कुछ भी दिख रहा है वह सब कल्पित ही है - ऐसा निश्चय करके सबको देखता हुआ वह ब्रह्म ही है।
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