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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 24
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया। प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता॥
जिस धीर पुरुष का चित्त स्वभाव से ही निर्विषय है, वह साधारण मनुष्य के समान प्रारब्ध वश बहुत से कार्य करता है पर उसका उसे न तो मान होता है और न अपमान ही।
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