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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 23
कुत्रापि न जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित्। आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
जिसका अंतर्मन शीतल और स्वच्छ है, जो आत्मा में ही रमण करता है, उस धीर पुरुष की न तो किसी त्याग की इच्छा होती है और न कुछ पाने की आशा।
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