प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्॥
तत्त्वज्ञ का प्रवृत्ति या निवृत्ति का दुराग्रह नहीं होता।
जब जो सामने आ जाता है तब उसे करके वह आनंद से रहता है।
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