अर्जयित्वाखिलान् अर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्।
न हि सर्वपरित्याजम-न्तरेण सुखी भवेत्॥
जगत के सभी पदार्थों को प्राप्त करके कोई बहुत से भोग प्राप्त कर सकता है पर उन सबका आतंरिक त्याग किये बिना सुखी नहीं हो सकता।
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