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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 15
येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै। निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥
जिसने इस संसार को वास्तव में देखा हो वह कहे कि यह नहीं है, नहीं है । जो कामना रहित है, वह तो इसको देखते हुए भी नहीं देखता।
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