न धावति जनाकीर्णं नारण्यं उपशान्तधीः।
यथातथा यत्रतत्र सम एवावतिष्ठते॥
शांत बुद्धि वाला धीर न तो जनसमूह की ओर दौड़ता है और न वन की ओर।
वह जहाँ जिस स्थिति में होता है, वहां ही समचित्त से आसीन रहता है।
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